अब ज़रा ये पढ़ें:-
पोस्ट कुछ यूँ है:-
गुफ्तगू से नहीं,लरजते अधर, सितम बोलते हैं,
भरम है उन्हें ये,कि हम कम बोलते हैं.
निगाहें हँसती भी मेरी, लगे नम बोलते हैं,
भरम है उन्हें ये,कि हम कम बोलते हैं.
किसी के हुनर को कलम,किसी के कदम बोलते हैं,
कोई ले अल्फाजों का सहारा,किसी के गम बोलते हैं.
गुफ्तगू से नहीं,लरजते अधर, सितम बोलते हैं,
भरम है उन्हें ये,कि हम कम बोलते हैं.
जो तल्ख़ हों मिजाज़ से,उनके अहम बोलते हैं,
तुम भी कहोगे मुख्तारी से, जो हम बोलते हैं.
नादाँ हैं जो दिलनशीं को, संगदिल सनम बोलते हैं.
सरारा होते हैं जिनके तहरीर में ,उनके दम बोलते हैं.
गुफ्तगू से नहीं,लरजते अधर, सितम बोलते हैं,
भरम है उन्हें ये,कि हम कम बोलते हैं.
अब इस मूल रचना को पढ़ें:-
जहाँ पर तुम्हारे सितम बोलते हैं
वहीं पर हमारे क़लम बोलते हैं
जहाँ बोलने की इजाज़त नहीं है
निगाहों से रंज-ओ-अलम बोलते हैं
ज़माने को ठोकर में रखने की चाहत
ये मन के तुम्हारे भरम बोलते हैं
किसी बेजुबाँ की जुबाँ बन के देखो
शब-ओ-रोज़ क्या अश्क-ए-नम बोलते हैं
जहाँ सर झुकाया ,वहीं काबा ,काशी
मुहब्बत में दैर-ओ-हरम बोलते हैं
बड़ी देर से है अजब हाल "आनन"
न वो बोलते हैं ,न हम बोलते हैं
आनंद पाठक जी की मूल रचना में अपने बोझिल शब्दों को ढूंस कर ससक्त लेखिका होने की कोशिश कि गयी है


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